मिटा दो मुझे

 मिटा दो मुझे

तुम मुझे
अपनी किताब से
मिटा दो हर्फ़ दर हर्फ़—
जैसे कोई पंक्ति
गलती से लिखी गई हो
और अब सही कर दी गई हो।

मेरे नाम पर
उँगलियों की स्याही फेर दो,
मेरी याद के कोनों को
रबर से घिस दो
इतना कि काग़ज़ पतला पड़ जाए।

ताकि
कभी दिल भी करे
तो तुम मुझे
याद न कर सको—
न मेरी आवाज़,
न मेरी आँखों का ठहराव,
न वो अधूरी बातें
जो हमने पूरी करने से पहले ही छोड़ दीं।

पर सुनो—
किताबें अक्सर
मिटाए गए शब्दों की छाप
सहेज लेती हैं।

सफ़्हा चाहे सफ़ेद दिखे,
अंदर कहीं
दबा हुआ अक्षर
अपना निशान छोड़ जाता है।

अगर सच में मिटाना हो,
तो मुझे अपने दिल से मिटाना—
क्योंकि काग़ज़ से नाम मिटते हैं,
याद से नहीं।

— मुकेश

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