लौटना, बिना वजह
कभी-कभी
हम लौटते हैं—
न किसी वादे की खींच से,
न किसी शिकायत की आग में,
बस यूँ ही…
जैसे हवा पुरानी गली पहचान लेती हो।
मैं भी लौटा था एक दिन
बिना वजह,
बिना इरादे के शोर के।
दरवाज़े वही थे,
दीवारों पर वही धूप,
सिर्फ़ हमारे बीच की दूरी
कुछ और पुरानी हो गई थी।
तुमने पूछा भी नहीं—क्यों?
मैंने बताया भी नहीं—कहाँ से?
हम दोनों जानते थे
कि वजहें अक्सर बहाने होती हैं,
और कुछ रिश्ते
कारणों से नहीं,
आदतों से बँधे रहते हैं।
लौटना, बिना वजह
शायद स्वीकार करना है
कि कुछ जगहें, कुछ लोग,
हमारे भीतर से कभी जाते ही नहीं।
और मैं
उसी अनकहे को थामे
फिर से चला आया था
तुम्हारी ख़ामोशी में
अपना नाम सुनने।
— मुकेश
No comments:
Post a Comment