आग और बारिश के बीच उसका प्रेम

 आग और बारिश के बीच उसका प्रेम

ठीक उस धुएँ की तरह था

जो भीगकर भी बुझता नहीं,

जलकर भी राख नहीं होता।


दिन में

वो धूप-सी तेज़,

सख़्त चट्टानों पर नंगे पाँव चलती हुई 

हथेलियों में श्रम की तपिश।


रात को

बरसात उतरती उसके कंधों पर,

और वो भीगती रहती चुपचाप 

जैसे हर बूँद

उसके भीतर की ज्वाला को

संतुलित कर रही हो।


उसका प्रेम

न सिर्फ़ तपता है,

न सिर्फ़ बरसता है 

वो दोनों के बीच

एक अदृश्य सेतु है।


जब वो रूठती है,

तो हवा में सूखी पत्तियों-सी खनक होती है;

जब वो मानती है,

तो मिट्टी से भाप उठती है 

गरम, सुगंधित, जीवित।


उसने सीखा है

कि आग रास्ता बनाती है,

और बारिश उसे बचाए रखती है।


इसीलिए उसका प्रेम

न बेकाबू लपट है,

न अंतहीन बाढ़ 

वो संतुलन है,

जहाँ ज्वाला भी जगह पाए

और मेघ भी।


जो इस प्रेम को समझ ले,

वो जान लेता है 

सच्चा अनुराग

या तो जला देता है,

या सींच देता है;

और कभी-कभी

दोनों एक साथ करता है।


मुकेश ,,,,,,,,,

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