सन्नाटे के फूल
सन्नाटे के फूल खड़े हैं,
जहाँ हवा भी धीरे-धीरे बहती है।
उनकी पंखुड़ियाँ सुनती हैं
हर अनकही कहानी, हर दबे कदम की गूँज।
कोई हाथ उन्हें नहीं छूता,
कोई नजर उन्हें नहीं देखती
फिर भी, वे खिले हैं,
अपनी चुप्पी में, अपने रहस्य में।
हर फूल की गंध में छुपा है एक सवाल,
हर रंग में एक अधूरी उम्मीद।
जो भी गुजरता है, उसकी आँखों से छूता नहीं,
पर उसकी आत्मा के भीतर हलचल पैदा करता है।
सन्नाटे के फूल
वे हमें याद दिलाते हैं कि मौन भी बोलता है,
और अकेलापन भी सिखाता है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,,
No comments:
Post a Comment