तीसरा आदमी
पति —
उसकी ज़िंदगी में,
एक ऐसा आदमी,
जिसके लिए व्रत रखती है,
सुबह, शाम, रात टहलती है,
उसकी जली-कटी सुनकर भी,
लात-घूँसा सहकर भी,
पर हर बात वही करती है,
उसकी हर आहट पे सजग रहती है,
उसका हर शब्द, उसके लिए आदेश है।
प्रेमी —
उसकी ज़िंदगी में,
एक दूसरा आदमी भी है,
जो उसके ख्वाबों में बसा है,
सबकी नज़रों से जुदा है,
जो सुखी रगों में बहता है।
साँसें भले पहले वाले के नाम से चलें,
पर खुशबू उसके नाम की महकती है,
जो सिर्फ उसे ही पता है।
और —
तीसरा आदमी भी है,
जिससे वो जब चाहे, फ़ोन लगा लेती है,
अपने सुख-दुख सुना आती है,
लड़ भी लेती है, रो भी लेती है।
पर जब मर्ज़ी हो तब ही बात करती है।
अगर ये तीसरा आदमी कहे "फ़ोन करो",
तो झट से भेजेगी "नहीं",
या देख कर अनदेखा कर देगी,
या मेसेज डिलीट कर देगी।
उसके पास कोई अधिकार नहीं,
ना फोटो मांगने का,
ना मुलाकात का,
ना लंबी बात का,
ना प्यार का।
फिर भी —
यह तीसरा आदमी,
ज़रूरी हो के भी गैर-ज़रूरी है।
उसके लिए कोई नाम नहीं।
जानते हो…
यही तीसरा आदमी — मैं हूँ,
और हर दूसरा आदमी भी
तीसरा आदमी है है
मुकेश।,,,,,,,,,,,,,,,,,
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