वन की साँवली दास्तान
वो आई
तो लगा जैसे धूप ने
साल के जंगल में
अपना काला-सुनहरा साया टाँक दिया हो।
उसका रंग
भीगी हुई ज़मीन पर पड़ी
बरसों पुरानी धूप-सा,
गहरा, महकता,
आँखों को ठहर जाने पर मजबूर करता हुआ।
कसा-गठा बदन
मानो किसी सख़्त तने ने
अपनी पूरी ताक़त
एक देह में उतार दी हो;
चलती है तो
बाँसों की लचक
उसके क़दमों में उतर आती है।
उरोज
दो जंगली आमों की तरह
भरपूर और बेक़ल,
जिनमें मौसम का रस
ठहरा हुआ हो।
नितम्बों की मृदुल गोलाई
धरती के उभार-सी,
जहाँ बीज भरो तो
फ़सलें मुस्कुराने लगें;
सघन जाँघें
वनपथ की दो पुख़्ता धाराएँ
हर चाल में
विश्वास की ठोस थाप।
उसकी कजरारी आँखें
घने सख़ुआ वन की सांझ हैं,
जहाँ दाख़िल हो जाओ
तो रोशनी भी इज़ाज़त लेकर चलती है।
चेहरा
नदी के स्वच्छ पानी-सा निष्छल,
जिसमें कोई छलावा नहीं,
सिर्फ़ साफ़ प्रतिबिंब।
और जब
वो जंगली फूलों का गजरा बाँधती है,
पलाश की आग,
महुए की मस्ती,
कुसुम की लाली
उसकी चोटी में बस जाती है
मानो पूरा जंगल
उसके इर्द-गिर्द सज्दा कर रहा हो।
वो हँसती है
तो पत्तों की सरसराहट में
एक नई रवानी घुल जाती है;
वो चुप होती है
तो लगता है
जैसे पहाड़ ने साँस रोक ली हो।
उसकी ख़ूबसूरती
शहरों की आईनों में क़ैद नहीं होती
वो तो
मिट्टी की गोद में पली
एक जीवित नज़्म है,
जिसे पढ़ने के लिए
दिल का वन होना ज़रूरी है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,
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