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Friday, 27 February 2026

धरती की कोख से जन्मा अनुराग

 धरती की कोख से जन्मा अनुराग

बीज की तरह चुप रहता है पहले,

अँधेरे में पलता है,

फिर एक दिन

रोशनी को चीरकर बाहर आ जाता है।


उसका प्रेम

आसमान से उतरा हुआ चमत्कार नहीं,

वो खेत की नमी है,

हल की धार के बाद

उठती हुई सोंधी साँस।


वो जब मुस्कराती है,

तो लगता है

जैसे नई कोंपल फूटी हो 

संकोची, पर अडिग।


उसकी आँखों में

दूर पहाड़ियों की शांति है,

और शब्दों में

बरसों की तपती धूप का धैर्य।


वो प्रेम को

काँच की तरह नहीं संभालती,

उसे मिट्टी में गूँथती है 

चूल्हे की आँच पर पकाती है,

पसीने की गंध से सींचती है।


धरती की कोख

सब कुछ सह लेती है 

गर्मी, सर्दी, बरसात 

और फिर भी

अन्न उगाती है।


वैसा ही उसका अनुराग है 

सहनशील,

उर्वर,

और जीवनदायी।


जो उसके साथ चलता है,

वो जानता है 

यह प्रेम

क्षणिक लहर नहीं,

यह तो वह धरा है

जिस पर घर बसाए जाते हैं।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,

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