पत्तों की सरसराहट में छुपा इकरार
कभी सीधे शब्दों में नहीं उतरता,
वो हवा के कंधे पर बैठकर
धीरे-धीरे दिल तक पहुँचता है।
साँझ ढलती है,
वन के ऊपर धुँधली सुनहरी चादर तनी है,
और पेड़ों की चोटियों पर
आख़िरी रोशनी काँप रही है।
उसी वक़्त
वो खड़ी होती है चुप —
आँचल में जंगली फूल,
पलकों पर अनकहा भरोसा।
कोई प्रतिज्ञा नहीं,
कोई ऊँची आवाज़ नहीं
बस पास से गुज़रती हवा
जब पत्तों को छूकर बोलती है,
तो लगता है
जैसे जंगल ने उसकी ओर से
“हाँ” कह दिया हो।
उसका प्रेम
घोषणा नहीं करता,
वो संकेत देता है
टहनी के हल्के झुकाव में,
सूखी घास की महक में,
धड़कन की अनसुनी लय में।
जो सुनना जानता है,
वो उस सरसराहट में
अपना नाम पहचान लेता है।
और जो नहीं सुन पाता,
उसके लिए
वो बस हवा है
पर उसके लिए
वही इकरार
जीवन भर की गूँज बन जाता है।
मुकेश ,,,,,,,,,
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