सफ़ेद की साज़िश

 सफ़ेद की साज़िश”


बस बर्फ़ थी

पर इस बार

वो चुप नहीं थी।


वो उतरती नहीं,

रेंगती थी आसमान से

जैसे किसी बूढ़े देवता की

सफ़ेद दाढ़ी टूट-टूट कर

धरती पर बिखर रही हो।


उसके हाथ में कोई कटार नहीं,

उसकी उँगलियाँ ही धार थीं

जो हवा की गर्दन पर

धीरे-धीरे फिरती रहीं।


रात ने जब आँखें मूँदीं,

उसने पलकों पर

ठंड की मुहर लगा दी।

ख़्वाबों के दरवाज़े

भीतर से जम गए।


पेड़ों की नसों में

हरकत बंद हो गई,

नदियाँ अपने ही शब्द

निगल कर सो गईं।


बर्फ़

सफ़ेद अँधेरा नहीं,

एक ऐसी रोशनी थी

जो सब रंगों को

अपने भीतर दफ़्न कर लेती है।


वो चमगादड़ों-सी नहीं,

गिरजाघरों की खामोश घंटियों-सी थी—

जो बजती नहीं,

बस समय को

ठंडा कर देती हैं।


सुबह जब आई,

धरती कफ़न में नहीं थी

वो तपस्या में बैठी थी।


बर्फ़ थी

पर मृत्यु नहीं,

एक लंबा, निर्वाक् विराम

जिसमें जीवन

अपनी अगली धड़कन

सुनने की प्रतीक्षा करता है।


मुकेश ,,,,,,,,,

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