तुम परियों के देश से आई हो

तुम परियों के देश से आई हो

या शायद

किसी अधूरे स्वप्न की आख़िरी सीढ़ी से उतरी हो।


तुम्हारी आँखों में

नीले आसमान की तहें हैं,

जिनमें बादल

चुपचाप अपने राज़ रखते हैं।


तुम जब बोलती हो,

हवा अपनी चाल बदल लेती है,

जैसे उसे याद आ गया हो

कोई पुराना गीत।


तुम्हारे पाँव धरती पर हैं,

पर छाया

थोड़ी-सी ऊपर चलती है

मानो गुरुत्व भी

तुम्हें पूरी तरह बाँध नहीं पाता।


तुम हँसती हो

तो धूप में

छोटे-छोटे दरवाज़े खुलते हैं,

जहाँ से उम्मीद

धीरे-धीरे बाहर आती है।


किस लोक से लाई हो

ये उजली सादगी?

ये अनकही करुणा?


तुम परियों के देश से आई हो

या फिर

इस दुनिया ने पहली बार

अपना ही बेहतर रूप

तुममें देख लिया है।


मुकेश ,,,,,,

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