आख़िरी सीढ़ी
शायद तुम
अधूरे स्वप्न की आख़िरी सीढ़ी से उतरी हो
जहाँ नींद और जाग
एक-दूसरे का हाथ थामे खड़े रहते हैं।
वहाँ,
जहाँ इच्छाएँ आधी खुली आँखों में
धीमे-धीमे साँस लेती हैं,
और स्मृतियाँ
अपने ही धुंध में लिपटी रहती हैं।
तुम उसी धुंध से निकली लगती हो
पाँवों में बादल की थरथराहट,
आँखों में अनकहे वादों की नमी।
जब तुम पास आती हो,
मेरे भीतर कोई पुराना सपना
अपनी राख झाड़ता है।
तुम्हारी आहट से
नींद की सीढ़ियाँ फिर बनती हैं
एक-एक पायदान
रोशनी से तराशा हुआ।
शायद तुम वही हो
जिसे स्वप्न ने पूरा होने से पहले
धरती पर भेज दिया
कि कोई उसे
जागती आँखों से भी देख सके।
मुकेश ,,,,,,,,,
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