तुम्हारी यादें चाँद की पगडंडियाँ हैं
तुम्हारी यादें
चाँद की पगडंडियाँ हैं
रात के सुनसान में
धीरे-धीरे उतरती हुई।
जब अँधेरा
अपने सबसे गहरे रंग में होता है,
वही पतली-सी उजली राह
मुझे तुम्हारी ओर ले चलती है।
कोई शोर नहीं,
कोई भीड़ नहीं
बस चाँदनी की हल्की परत
और कदमों की आहट।
इन पगडंडियों पर
चलते हुए
समय धीमा हो जाता है,
साँसें भी
थोड़ी सँभलकर चलती हैं।
कभी-कभी
बादल आकर
रास्ता ढँक लेते हैं,
पर मैं जानता हूँ
चाँद कहीं गया नहीं,
बस परदे के पीछे है।
तुम्हारी यादें
मुझे गिरने नहीं देतीं,
वे अँधेरे में भी
एक सफ़ेद रेखा खींच देती हैं।
मैं उन्हीं पर चलता हुआ
अपनी थकान उतार देता हूँ,
और रात
कम अकेली लगने लगती है।
तुम्हारी यादें
चाँद की पगडंडियाँ हैं
जहाँ पहुँचकर
मैं हर बार
थोड़ा-सा उजाला
अपने भीतर ले आता हूँ।
मुकेश ,,,,,,,,
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