तुम्हारी यादें धूप की सीढ़ियाँ हैं

 तुम्हारी यादें धूप की सीढ़ियाँ हैं


तुम्हारी यादें

धूप की सीढ़ियाँ हैं

जिन पर चढ़ते हुए

मैं अँधेरे से बाहर आता हूँ।


हर पायदान पर

एक मुस्कान रखी है तुमने,

एक अधूरा वाक्य,

एक छूटी हुई हँसी।


जब मन बहुत नीचे गिरता है,

मैं उन्हीं सीढ़ियों पर

धीरे-धीरे पाँव रखता हूँ

और रोशनी

मेरे कंधों तक भरने लगती है।


तुम्हारी आवाज़

जैसे दोपहर की गर्माहट,

जो ठिठुरते भीतर को

संभाल लेती है।


कभी-कभी

कोई बादल आ जाता है,

सीढ़ियाँ धुँधली हो जाती हैं

पर धूप कहीं जाती नहीं,

बस थोड़ा ठहर जाती है।


तुम्हारी यादें

सिर्फ़ स्मृतियाँ नहीं,

वे रास्ता हैं—

जो ऊपर ले जाता है,

जहाँ आसमान

थोड़ा और पास लगता है।


मैं जानता हूँ,

हर सीढ़ी पर

तुम्हारा स्पर्श नहीं मिलेगा

पर जो उजाला है,

वही काफी है।


तुम्हारी यादें

धूप की सीढ़ियाँ हैं—

और मैं

अब भी चढ़ रहा हूँ।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,

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