दर्द की लिखी हुई पनाहगाह

दर्द की लिखी हुई पनाहगाह में

मैंने अपना नाम दर्ज नहीं किया,

बस कुछ भीगे हुए हरफ़ छोड़ दिए हैं

जो मेरी जगह गवाही देते हैं।


ये दीवारें ईंटों की नहीं 

आहों की हैं,

इनकी छत पर

तन्हाई की धुंध जमी रहती है।


जब भी कोई ज़ख़्म

बहुत ज़्यादा बोलने लगता है,

मैं उसे यहाँ ले आता हूँ,

स्याही की चादर ओढ़ा देता हूँ,

ताकि वो चीख़

शेर बन जाए।


अजीब है ये पनाहगाह 

यहाँ रोना कमज़ोरी नहीं,

इबादत लगता है;

यहाँ टूटना

बिखरना नहीं,

एक नई तामीर की शुरुआत है।


हर दाग़ को

मैंने अल्फ़ाज़ की शक्ल दी,

हर दरार को

मतला बना दिया,

कि दर्द

बदनाम न रहे 

दास्तान बन जाए।


और अब

जो भी मेरे काग़ज़ पलटता है,

उसे सिर्फ़ शायरी नहीं मिलती 

उसे एक ठिकाना मिलता है,

जहाँ उसका अपना दर्द भी

चुपचाप बैठ सकता है।


मुकेश ,,,,,,,,,,

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