तुम्हारी यादें हवा में बँधी पतंगें हैं
तुम्हारी यादें
हवा में बँधी पतंगें हैं
जो हर संध्या
मेरी छत से उठती हैं
और नीले में अपना घर खोजती हैं
डोर मेरे हाथ में रहती है
पर उसकी दिशा
तुम्हारी ओर झुकी होती है
जैसे हवा भी जानती हो
किसका नाम पुकारना है
कभी वे तेज़ झोंकों में
बेहद ऊँची चली जाती हैं
इतनी कि आँखों में पानी भर आए
कभी धीमे-धीमे डोलती हैं
मानो ठहर कर
मुझे ही देख रही हों
इन पतंगों पर
लिखे नहीं होते शब्द
पर हर रंग
एक अधूरी बातचीत है
हर कंपन
एक अनकहा स्पर्श
मैं डोर को ढीला भी छोड़ता हूँ
कभी कसकर थामता भी हूँ
पर सच यह है
कि उड़ान मेरी नहीं
उनकी है
अगर किसी दिन
डोर सचमुच कट भी जाए
तो भी वे गिरेंगी नहीं
किसी और आकाश में
अपना रास्ता बना लेंगी
तुम्हारी यादें
हवा में बँधी पतंगें हैं
और मैं
अब भी
आसमान की ओर देखना नहीं छोड़ पाया हूँ
मुकेश ,,,,,,
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