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Saturday, 28 February 2026

तुम्हारी यादें हवा में बँधी पतंगें हैं

 तुम्हारी यादें हवा में बँधी पतंगें हैं


तुम्हारी यादें

हवा में बँधी पतंगें हैं

जो मेरी छत से उड़ती हैं

पर आसमान तुम्हारा नापती हैं


डोर मेरे हाथ में है

पर खिंचाव तुम्हारी ओर है

हर झोंका

तुम्हारा नाम लेकर आता है


कभी वे बहुत ऊपर चली जाती हैं

इतनी कि आँखें चुँधिया जाएँ

कभी अचानक नीचे झुकती हैं

जैसे पुकार रही हों


इन पतंगों पर

कोई रंग स्थिर नहीं

कभी सावन का हरा

कभी संध्या का केसरिया

कभी चाँदनी का फीका सफेद


मैं डोर थामे खड़ा रहता हूँ

छत पर अकेला

पर आसमान भरा रहता है

तुम्हारी हल्की उपस्थिति से


डर भी लगता है

कि कहीं डोर कट न जाए

पर फिर सोचता हूँ

कुछ यादें उड़ने के लिए ही होती हैं


अगर वे लौट आएँ

तो हथेली पर रख लूँगा

अगर दूर चली जाएँ

तो भी उन्हें देखता रहूँगा


तुम्हारी यादें

हवा में बँधी पतंगें हैं

और मैं अब भी

उसी खुले आकाश के नीचे खड़ा हूँ


मुकेश ,,,,,,,,,,,,

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