तुम्हारी यादें हवा में बँधी पतंगें हैं
तुम्हारी यादें
हवा में बँधी पतंगें हैं
जो मेरी छत से उड़ती हैं
पर आसमान तुम्हारा नापती हैं
डोर मेरे हाथ में है
पर खिंचाव तुम्हारी ओर है
हर झोंका
तुम्हारा नाम लेकर आता है
कभी वे बहुत ऊपर चली जाती हैं
इतनी कि आँखें चुँधिया जाएँ
कभी अचानक नीचे झुकती हैं
जैसे पुकार रही हों
इन पतंगों पर
कोई रंग स्थिर नहीं
कभी सावन का हरा
कभी संध्या का केसरिया
कभी चाँदनी का फीका सफेद
मैं डोर थामे खड़ा रहता हूँ
छत पर अकेला
पर आसमान भरा रहता है
तुम्हारी हल्की उपस्थिति से
डर भी लगता है
कि कहीं डोर कट न जाए
पर फिर सोचता हूँ
कुछ यादें उड़ने के लिए ही होती हैं
अगर वे लौट आएँ
तो हथेली पर रख लूँगा
अगर दूर चली जाएँ
तो भी उन्हें देखता रहूँगा
तुम्हारी यादें
हवा में बँधी पतंगें हैं
और मैं अब भी
उसी खुले आकाश के नीचे खड़ा हूँ
मुकेश ,,,,,,,,,,,,
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