महफ़ूज़ ज़ख़्मों की रवानी
कुछ ज़ख़्म ऐसे भी होते हैं
जिन्हें हम भरने नहीं देते,
उन्हें सीने के तहख़ाने में
नर्मी से सजा कर रखते हैं।
महफ़ूज़ ज़ख़्मों की ये रवानी
अजीब कैफ़ियत रखती है —
न वो पूरी तरह दर्द बनते हैं,
न पूरी तरह दवा।
हर धड़कन के साथ
उनकी हल्की-सी लहर उठती है,
जैसे किसी पुरानी धुन की
मद्धम गूँज।
तेरी जुदाई का निशाँ भी
कुछ ऐसा ही है —
नासूर नहीं,
मगर मिटता भी नहीं;
बस एक ख़ुशबू-ए-ग़म की तरह
रगों में बहता रहता है।
मैंने इन्हें छुपा कर रखा है
दुनिया की नज़रों से,
कि ये ज़ख़्म
मेरी पहचान भी हैं
और मेरी पनाह भी।
अजीब बात है —
इनकी रवानी में ही
दिल को सुकून मिलता है,
जैसे दर्द ने ही
मोहब्बत का सबक
आहिस्ता-आहिस्ता समझाया हो।
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