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Friday, 27 February 2026

सिसकियों के रेशमी धागे

 सिसकियों के रेशमी धागे


सिसकियों के रेशमी धागे

मैंने रात की उँगलियों में थमा दिए हैं,

कि वो चाँदनी की ओट में

मेरे दिल का फटा हुआ किनारा सी दे।


हर आह को

नर्मी से कात कर धागा बनाया है,

हर आँसू को

मोती समझ कर पिरोया है मैंने।


ये जो लिबास-ए-ख़ामोशी है,

बाहर से कितना सादा दिखता है,

मगर भीतर

सिसकियों की कढ़ाई चलती रहती है।


कभी तेरी याद

हल्की-सी सिलवट बन जाती है,

कभी तेरी जुदाई

पूरा सीना उधेड़ देती है।


मैंने चाहा था

कि दर्द को अलमारी में बंद कर दूँ,

मगर वो हर बार

रेशमी धागा बनकर निकल आता है,

और दिल के दामन से लिपट जाता है।


अब हाल ये है

कि हर सिसकी में एक लुत्फ़-ए-ग़म है,

हर टूटन में तेरी नर्मी की छाप 

मैं रोता भी हूँ

तो यूँ लगता है

जैसे कोई नाज़ुक दस्तकार

मेरी रूह पर

मोहब्बत की बारीक सिलाई कर रहा हो।


मुकेश ,,,,,,,,,,,

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