उधड़ी हुई रूह का लिबास

 उधड़ी हुई रूह का लिबास


उधड़ी हुई रूह का लिबास

मैंने बरसों से ओढ़ रखा है,

हर दरार में कोई ख़ामोश चीख़,

हर सिलवट में कोई बुझी हुई लौ।


ये कपड़ा कभी नूर से बुना था,

तेरी मोहब्बत की नरम किरनों से;

मगर वक़्त की बेरहम उँगलियों ने

इसे आहिस्ता-आहिस्ता उधेड़ दिया।


अब हाल ये है कि

जहाँ सीता हूँ, वहीं से खुल जाता है,

हर टाँका एक नई टीस को जन्म देता है,

हर गिरह में एक अधूरा ख़्वाब अटका है।


कभी तेरी याद

रेशमी पैबंद बनकर उतरती है,

तो कुछ पल को लगता है

कि ये लिबास फिर से मुकम्मल हो जाएगा;

मगर अगली ही साँस में

कोई पुराना ज़ख़्म मुस्कुरा उठता है।


मैं इस उधड़े हुए वजूद को

छुपाता भी नहीं अब —

कि इसकी बेतरतीबी में ही

इश्क़ की सच्चाई चमकती है।


अगर कोई पूछे

कि क्यों नहीं उतार फेंकता

ये फटा हुआ पैरहन,

तो क्या कहूँ 


ये लिबास भले ही चाक-चाक हो,

मगर इसकी हर रग में

तेरा नाम सिला हुआ है,

और मेरी रूह

अब किसी और कपड़े में

ढल नहीं सकती।


मुकेश ,,,,,,,,,,

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