तेरे नाम के धागे से ही पिरोया है
दामन-ए-दिल अपना,
वरना ये चीरा-चीरा लिबास
कब का बिखर गया होता।
हर टाँका तेरी सदा से रोशन है,
हर गिरह में तेरी याद की महक,
मैंने तो बस उँगलियों को थामा है
सिलाई तो तेरी मोहब्बत ने की है।
जब-जब ज़ख़्म उधड़ने लगे,
तेरा नाम सुई बनकर उतर आया,
और टूटती हुई सांसों के बीच
एक नया सहारा दे गया।
ये दामन अब भी सलामत है
तो सिर्फ़ इस करम से
कि तेरे नाम का धागा
अब तक टूटा नहीं।
मैं जानता हूँ,
एक दिन ये कपड़ा भी थक जाएगा,
मगर जब तक
तेरे हरफ़ की नर्मी साथ है,
दामन-ए-दिल
यूं ही पिरोया रहेगा।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,
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