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Friday, 27 February 2026

जैसे कोई ख़ामोश मिसरा

 जैसे कोई ख़ामोश मिसरा"


जैसे कोई ख़ामोश मिसरा,

जो लफ़्ज़ बनने से पहले ही इश्क़ में पिघल गया,

साँसों की रूह में उतरकर,

एक नज़्म की तरह धड़कता रह गया।


वक़्त ठहरा उसकी पलकों पर,

और ख़्वाबों ने उस ठहराव को चूमा,

रात की तहों में उसने कुछ कहा नहीं,

बस ख़ामोशी से मेरा नाम लिया।


मैंने उस ख़ामोशी को सुना 

वो आहट थी या इबादत,

कोई नहीं जानता,

पर दिल ने सज्दा कर दिया।


उसकी नज़र — एक आयत थी,

जो हर्फ़ नहीं, असर बनकर उतरी,

हर बार जब वो मुस्कुराई,

लफ़्ज़ों की दुनियाँ में नूर उतर आया।


जैसे कोई ख़ामोश मिसरा,

जो ख़ुद में पूरा एक क़ुरान हो,

हर हरफ़ में एक क़ायनात,

हर ठहराव में एक सदी की रूह हो।


मैं उसके होंठों की ख़ुशबू से आयतें लिखता हूँ,

उसके बालों की गिरती लट में दुआ ढूँढता हूँ,

उसकी मुस्कान में खुदा का नूर छुपा है,

और उसकी चुप्पी में मेरा जवाब।


कभी वो कहती नहीं,

फिर भी हर बार सुनाई देती है 

उसकी साँसों में राग,

उसकी ख़ामोशी में साज़।


वो चलती है जैसे वक़्त बहता हो,

हर कदम में एक नयी तहकीक़,

हर करवट में एक नई सृष्टि जन्म लेती है,

और मैं बस दर्शक बना, ख़ुद को खो देता हूँ।


जैसे कोई ख़ामोश मिसरा,

जो रूह से उतर कर, दिल में गूंजे,

कभी दुआ बन जाए,

कभी जलता सवाल बन जाए।


वो है या नहीं, अब ये मायने नहीं,

क्योंकि अब वो मेरी सांसों में बसी है,

हर लम्हा जो जिया,

वो उसी का बयान है 

जैसे कोई ख़ामोश मिसरा।


मुकेश ,,,,,,,,,,,

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