नींद और ख़याल के दरमियान

 नींद और ख़याल के दरमियान


एक लम्हा ठहर जाता है,

जहाँ आँखें बंद होती हैं

मगर दिल

जागता रहता है।

वहीं तुम

बिना आवाज़

मेरे पास आ बैठते हो—

न सपना बनकर,

न हक़ीक़त होकर।

बस

एक एहसास की तरह,

जो कहता कुछ नहीं,

और फिर भी

सब कुछ कह जाता है।

नींद

मुझे खींचती है अपनी तरफ़,

ख़याल

तुम्हारी तरफ़

और मैं

दोनों के बीच

थोड़ी देर

ज़िन्दा रहता हूँ।

मुकेश,, 

Comments

Popular posts from this blog

एक मुसाफिर की डायरी से --------------

एकांत एक नदी है

बात दोनों तरफ हो तो मज़ा देता है