बिना दीवारों का सपना

 बिना दीवारों का सपना

मैंने एक सपना देखा 

जिसमें घर था,

पर कोई दीवार नहीं।


हवा भीतर आती थी

जैसे कोई अपना,

और जाती थी

बिना अलविदा कहे।


उस घर में

राज़ नहीं छुपाए जाते थे,

वे धूप की तरह

खुले फर्श पर पसरे रहते थे।


रात आती

तो चाँद

चुपचाप आकर

आँगन में बैठ जाता,

और सितारे

बच्चों-से इधर-उधर दौड़ते।


कोई कोना नहीं था

जहाँ भय टिक सके,

कोई छाया नहीं

जहाँ संदेह पल सके।


हमने वहाँ

सिर्फ़ विश्वास बोया था 

और हर सुबह

वह नई कोंपल की तरह

फूट पड़ता।


बारिश होती

तो छत नहीं टपकती,

क्योंकि छत थी ही नहीं 

भीगना ही

उस घर की आदत थी।


हमारे आँसू

वहीं सूखते थे

पेड़ों की पत्तियों पर,

और हँसी

खुले आकाश में

घंटी-सी बजती रहती।


उस सपने में

ताले नहीं थे,

क्योंकि कुछ भी

किसी का अकेले का नहीं था।


सुबह जब आँख खुली,

तो दीवारें फिर से खड़ी थीं 

पर भीतर कहीं

अब भी बचा है

वह बिना दीवारों का सपना,


जहाँ प्रेम

किसी सीमा में नहीं रहता,

और घर

सिर्फ़ एक-दूसरे की

धड़कनों से बनता है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,

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