जहाँ आसमान हमारा पता है,
वहाँ डाकिया बादल होता है
और चिट्ठियाँ
हवा की जेब में रखी मिलती हैं।
वहाँ किसी नक़्शे पर
खिंची नहीं होती सीमाएँ,
सिर्फ़ पगडंडियाँ होती हैं
जो कदमों की नीयत से बनती हैं।
हमने वहीं रखा है
अपना छोटा-सा संसार
एक चटाई धूप की,
एक तकिया चाँद का,
और कुछ सपने
जो हर रात
रंग बदल लेते हैं।
वहाँ दरवाज़ा नहीं,
बस खुलापन है—
जिससे जो आए
अपना दुःख उतार सके।
पेड़ों से सीखते हैं हम
झुककर ऊँचा होना,
नदियों से
बहकर ठहरना।
हमारी रसोई में
आग नहीं,
आशा जलती है।
हमारी थाली में
रोटी नहीं,
परिश्रम की महक होती है।
और जब कभी
थकान बहुत गहरी हो जाती है,
हम पीठ टिकाकर
आसमान को देखते हैं
वही हमारा स्थायी पता है,
वही हमारी छत,
वही हमारी पहचान।
अगर कोई पूछे
“तुम कहाँ रहते हो?”
हम मुस्कुरा कर कहते हैं—
जहाँ सीमाएँ ख़त्म होती हैं,
और मन
अपना नाम
खुले नीले में लिख देता है।
वहीं।
मुकेश ,,,,,,,,,
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