उधर चलो,
जहाँ ज़मीन अभी तक
किसी नक़्शे में दर्ज नहीं हुई।
वहाँ हम रख देंगे
अपने नामों की जगह
बस साँसों की आहट।
कोई दीवार नहीं होगी
हवा ही सहारा बनेगी,
और खुलापन ही हमारा आँगन।
रात जब थकेगी
तो सितारे उतर आएँगे
चारपाई बनकर।
सुबह
ओस की बूँदों में
हम अपना चेहरा धोएँगे।
पेड़ों की शाखों पर
टाँग देंगे दिन भर की चिंताएँ,
और पत्तों से छनकर
धूप सिखाएगी
सहन करना।
हम बीज नहीं,
इरादे बोएँगे
और फसल में
विश्वास काटेंगे।
नदी को नहीं बाँधेंगे,
बस उसकी आवाज़
घड़े में भर लेंगे
प्यास लगने पर
सुनने के लिए।
पहाड़ों से कहेंगे
थोड़ा धैर्य उधार दो,
मैदानों से
थोड़ी सरलता।
और जब कभी
सन्नाटा बहुत गहरा हो जाएगा,
हम उसी में
अपनी धड़कनों की
हल्की-सी चहल-पहल ढूँढ़ लेंगे।
बस एक काम रहेगा
कुछ पन्ने संभाल कर रखना,
जिन पर लिखा होगा
हमने कैसे
खुली हवा में
एक घर बसाया था।
अगर कोई
बरसों बाद
उन पन्नों को खोले,
तो उसे महसूस हो
घर ईंटों से नहीं,
एक-दूसरे की
अनकही सहमति से बनता है।
उधर चलो
वहीं रहते हैं
हम जैसे
जो भीड़ में नहीं,
खुले आसमान में
अपना नाम पुकारते हैं।
मुकेश ,
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