न बना सका तुम्हारा मौसम

 न बना सका तुम्हारा मौसम

(बिमल कुमार की कविता से प्रेरित )


चाहा था

तुम्हें अपना सूरज बना लूँ

थोड़ी-सी धूप रख लूँ जेब में,

ठंडे दिनों में

खोलकर पहन लूँ।

पर तुम

मेरी हथेली पर ठहरी ही नहीं।


सोचा था

तुम्हें एक रास्ता बना लूँ,

चलता रहता उम्र भर

तुम्हारी दिशा में।

पर तुमने अपने नक़्शे

किसी और शहर में रख छोड़े थे।


मैंने चाहा

तुम मेरी आवाज़ बन जाओ

जब गला भर आए

तो तुम बोलो मेरी जगह।

पर तुमने

मेरी ख़ामोशी भी

अपने पास नहीं रखी।


मैंने सोचा

तुम्हें एक सपना बना लूँ,

जिसे हर रात देख सकूँ।

पर तुम नींद की तरह थीं

आती थीं,

और बिना वजह टूट जाती थीं।


मैं तुम्हें

अपना मौसम भी न बना सका

न बारिश,

न धूप,

न हवा का एक छोटा-सा झोंका।


दुख इस बात का कम है

कि तुम मेरी नहीं बनीं,

दुख यह है

कि मैं भी तुम्हारा

कोई रूप न ले सका

न दीवार,

जिससे टिककर तुम रो सको,

न आईना,

जिसमें तुम खुद को पहचान सको।


मैं तैयार था

तुम्हारे लिए

छाया बनने को,

धूल बनने को,

यहाँ तक कि

एक साधारण-सी पगडंडी बनने को भी


पर तुमने

मेरे होने को

कोई नाम नहीं दिया।


मैं आज भी खड़ा हूँ

तुम्हारी राह के किनारे—

पेड़ नहीं बना,

फूल नहीं बना,

काँटा भी नहीं—


बस एक इंतज़ार बना हूँ,

जो हर गुजरते मौसम में

तुम्हारा होना

सीखता रहता है।


— मुकेश

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