चाँदनी, ख़ामोशी और तुम चाँदनी
चाँदनी, ख़ामोशी और तुम
चाँदनी
आहिस्ता-आहिस्ता
मेरे कमरे में उतर आई है,
और तुम्हारी ख़ामोशी
उससे भी ज़्यादा रौशन है।
तुम कुछ कहते नहीं,
फिर भी
दिल
सब समझ लेता है।
इस रात में
न सवाल हैं,
न जवाब
बस
चाँदनी है,
ख़ामोशी है,
और तुम।
इतना काफ़ी है।
मुकेश,,,
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