धूप के दरवाज़े

 धूप के दरवाज़े


तुम हँसती हो

तो धूप में

छोटे-छोटे दरवाज़े खुलते हैं


जैसे सुबह ने

अपने गुप्त कमरे

एक-एक कर खोल दिए हों।


उन दरवाज़ों से

गिरती है रोशनी की महीन धूल,

जो थके चेहरों पर

धीरे से बैठ जाती है।


तुम्हारी हँसी

सिर्फ़ आवाज़ नहीं,

एक चाबी है

जो बंद पड़ी दोपहरों को

फिर से चलना सिखाती है।


जब तुम मुस्कराती हो,

दीवारों की सख़्ती पिघलती है,

और हवा

थोड़ी कम अकेली लगती है।


तुम हँसती हो

तो लगता है

दुनिया ने अपने भीतर

एक और खिड़की खोज ली है,

जहाँ से उम्मीद

बिना दस्तक के

अंदर चली आती है।


मुकेश ,,,,,,,

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