आँसुओं की तह में रखे अल्फ़ाज़

 आँसुओं की तह में रखे अल्फ़ाज़

यूँ ही नहीं मिलते,

उन्हें ढूँढना पड़ता है

दिल की भीगी दराज़ों में।


हर आँसू

सिर्फ़ पानी नहीं होता,

उसमें कोई अधूरा वाक्य

घुला हुआ रहता है,

कोई नाम

जो होंठों तक आकर लौट गया।


मैंने कई बार

इन हरफ़ों को सुखाने की कोशिश की,

मगर सूखते ही

इनकी चमक कम हो जाती है।

भीगे रहें

तो ज़्यादा सच्चे लगते हैं।


काग़ज़ पर उतरते हैं

तो हल्की-सी सिलवट छोड़ जाते हैं,

जैसे रूह ने

अपनी उँगली से निशान बना दिया हो।


ये अल्फ़ाज़

किसी महफ़िल के लिए नहीं,

किसी तालियों के लिए नहीं 

ये तो बस

उन लम्हों की अमानत हैं

जो रोते हुए गुज़रे।


और जब कोई

उन्हें पढ़ते-पढ़ते ठहर जाता है,

तो समझ जाता है 

कि आँसुओं की तह में

जो रखा जाता है,

वो कभी झूठ नहीं होता।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,

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