महकता हुआ चाँद और बहकते हुए बादल

 महकता हुआ चाँद और बहकते हुए बादल


महकता हुआ चाँद

आज कुछ ज़्यादा क़रीब लगता है,

जैसे उसने तेरी ज़ुल्फ़ों की

ख़ुशबू उधार ले ली हो।


और ये बहकते हुए बादल 

किसी आशिक़ की तरह

उसके आस-पास मंडरा रहे हैं,

कभी छू लेने की ख़्वाहिश में,

कभी ख़ुद ही बिखर जाने की हद तक।


रात की पेशानी पर

रौशनी का नरम टीका है,

हवा में कोई अनकहा पैग़ाम,

जो दिल तक आते-आते

मधुर सरगोशी बन जाता है।


चाँद की चुप मुस्कान में

एक मीठी-सी तन्हाई है,

और बादलों की आवारगी में

बेक़रार मोहब्बत।


कभी वो उसे ढँक लेते हैं,

कभी फिर रास्ता दे देते हैं 

जैसे इश्क़ में

रुसवाई और रहमत

साथ-साथ चलती हों।


मैं खिड़की से टिक कर

ये मंज़र देखता हूँ,

और सोचता हूँ 

अगर चाँद महक सकता है

तो मोहब्बत भी

आसमान भर फैल सकती है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,

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