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Friday, 27 February 2026

लरज़ते लफ़्ज़ों की ओट

 लरज़ते लफ़्ज़ों की ओट में

मैंने अपना दिल छुपा लिया है,

कि सीधी बात कहने की हिम्मत

अब आवाज़ में बाकी नहीं।


ये जो हरफ़ काँपते हुए उतरते हैं,

इनके पीछे एक तूफ़ान है 

मगर काग़ज़ पर आते-आते

वो बस नमी बन कर रह जाता है।


कभी तेरी याद

उँगलियों को थरथरा देती है,

कभी कोई अधूरा वाक्य

सीने में अटक जाता है।


मैं खुल कर रो भी नहीं सकता,

खुल कर हँस भी नहीं सकता —

इसलिए मैंने

इन लरज़ते लफ़्ज़ों की ओट चुन ली है।


यहाँ दर्द भी पर्दे में रहता है,

और मोहब्बत भी बेआवाज़,

बस हल्की-सी कंपन

हर पंक्ति के किनारे थिरकती है।


जो समझने वाले हैं,

वो इस ओट के पार देख लेते हैं 

उन्हें मालूम है

कि हर काँपता हुआ शब्द

किसी गहरी सच्चाई का

सबूत होता है।


और मैं…

अब इसी ओट में महफ़ूज़ हूँ,

जहाँ दिल टूटता भी है

तो आवाज़ नहीं करता।


मुकेश ,,,,,,,,,

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