नीम के साये में समय

 नीम के साये में समय

धीरे-धीरे बैठ जाता है 

किसी बूढ़े साधु की तरह,

जिसे जल्दी कहीं पहुँचना नहीं।


उसकी कड़वी गंध में

जीवन का सच घुला है,

मीठे भ्रमों से दूर

एक सादा-सा स्वीकार।


पत्तों की हल्की सरसराहट में

बरसों की कथाएँ हैं 

धूप, आँधी, और प्रतीक्षा की।


मैं उस छाँव में ठहरता हूँ,

तो लगता है

घड़ी की सुइयाँ थक गई हैं,

और समय ने

अपना बोझ उतार दिया है।


नीम के साये में

वक़्त सिखाता है 

कड़वाहट भी औषधि है,

यदि उसे धैर्य से जिया जाए।


मुकेश ,,,,,,,,,,,

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