तेरी मौजूदगी ही काफ़ी है

 “तेरी मौजूदगी ही काफ़ी है”


तेरी मौजूदगी ही काफ़ी है,

कि दिल को किसी सबूत की ज़रूरत नहीं रहती।

तू पास हो तो ख़ामोशी भी बोलने लगती है।


ना लफ़्ज़ चाहिए, ना वादे,

बस तेरी साँसों की आहट,

जो मेरे वजूद में उतरती रहे।


तेरी आँखों का सुकून

मेरी बेचैन रूह का मरहम है।

तू बैठा रहे सामने यूँ ही,

तो वक़्त भी सजदे में चला जाए।


तेरी मौजूदगी ही काफ़ी है,

कि हर कमी मुकम्मल लगे,

हर तन्हाई आबाद हो जाए,

और मैं 

ख़ुद को तेरे नूर में पाता रहूँ।


मुकेश ,,,,,,,

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