धरती पर रखा एक आलिंगन
हमने
अपने हाथों की ऊष्मा से
एक आलिंगन गढ़ा
और उसे
धीरे से धरती पर रख दिया।
वह कोई मूर्ति नहीं था,
न किसी पर्व का अनुष्ठान
बस दो थकी हुई देहों के बीच
एक विश्वास की पुलिया।
धरती ने उसे
चुपचाप स्वीकार लिया,
जैसे माँ
बच्चे की पहली हिचकी
सहेज लेती है।
घास ने
उस आलिंगन के चारों ओर
हरा घेरा बना दिया,
कि कोई कठोर कदम
उसे ठेस न पहुँचा सके।
बारिश आई
तो बूंदें
उसकी पीठ सहलाने लगीं,
और धूप ने
उसमें थोड़ी-सी उजास भर दी।
वह आलिंगन
अब भी वहीं रखा है
हर उस जगह
जहाँ मनुष्य
थककर बैठ जाता है
और सिर झुका देता है।
जब कोई
अपना दुःख धरती पर रखता है,
वही आलिंगन
धीरे से उसे ढँक लेता है।
क्योंकि प्रेम
कभी हवा में ही नहीं रहता,
वह मिट्टी में भी
अपना ताप छोड़ जाता है।
और हम
बस उसके साक्षी हैं,
जो जानते हैं
कि धरती पर रखा एक आलिंगन
आकाश तक पहुँच जाता है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,,
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