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Saturday, 28 February 2026

खुली हवा में दर्ज नाम

 खुली हवा में दर्ज नाम

हमने अपना नाम

किसी पत्थर पर नहीं लिखा,

न ही धातु की पट्टिकाओं पर

हमने उसे छोड़ दिया

खुली हवा में।


हवा जानती है

किसे कहाँ ले जाना है।

वह हमारे अक्षरों को

पेड़ों की फुनगियों तक पहुँचाती है,

जहाँ पत्तियाँ

धीरे-धीरे उन्हें पढ़ती हैं।


नदी भी जानती है

वह बहते हुए

हमारे नाम का स्वाद

पानी में घोल देती है,

ताकि जो पिए

उसे एक अनकहा परिचय मिले।


हमने अपने नाम

धूप की सीढ़ियों पर रखे,

कि हर सुबह

वे चमक उठें

बिना किसी दावा-हक़ के।


कोई शिला-लेख नहीं,

कोई इतिहास की मुहर नहीं

बस एक हल्की-सी ध्वनि,

जो सन्नाटे में भी

सुनाई देती रहे।


कभी-कभी

जब हवा अचानक

चेहरे को छू जाती है,

लगता है

जैसे किसी ने पुकारा हो।


शायद वही हमारा नाम है,

जो अब भी

खुले आकाश में

तैर रहा है

बिना बंधन,

बिना भय,

बिना सीमा।


और यदि

समय की आँधी

सब कुछ मिटा भी दे,

तो भी हवा में दर्ज नाम

मिटते नहीं

वे बस

रूप बदल लेते हैं,

और फिर किसी नई सुबह

किसी और की साँसों में

जन्म ले लेते हैं।


मुकेश ,,,,,,,,,,

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