तुलसी के पत्तों में प्रार्थना

 तुलसी के पत्तों में प्रार्थना


आँगन के एक कोने में

तुलसी चुपचाप खड़ी है 

जैसे घर की धड़कन

मिट्टी में रोपी गई हो।


उसके पत्तों पर

सुबह की ओस ठहरती है,

मानो रात भर की चिंताएँ

धीरे से धुल गई हों।


हर संध्या दीये की लौ

जब उसे छूती है,

हवा में घुल जाती है

एक धीमी-सी प्रार्थना 

जिसमें शब्द कम,

विश्वास अधिक होता है।


तुलसी के पत्तों में

घर का सुकून बसता है,

माँ की आवाज़,

पिता की चुप चिंता,

और बच्चों की अधूरी हँसी।


वह कहती नहीं कुछ भी 

बस महकती है,

जैसे आस्था

अब भी जीवित है

इस थके हुए समय में।


मुकेश ,,,,,,

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