ओस में नहीं, आँसुओं से भीगी है ये रात

 ओस में नहीं,

आँसुओं से भीगी है ये रात 

आसमान की पलकों पर

कोई गहरा ख़्वाब टूट गया है।


चाँद भी आज

कुछ धुँधला-सा है,

जैसे उसने भी

किसी याद को छुपा कर रखा हो।


हवा की सरगोशियों में

नमी कुछ ज़्यादा है,

ये सिर्फ़ मौसम का असर नहीं 

किसी दिल की ख़ामोश सज़ा है।


तारों की चमक

किसी भीगी दुआ-सी काँप रही है,

और सन्नाटा

लंबी सिसकी बन कर

रात के सीने में अटका है।


मैं खिड़की पर टिक कर सोचता हूँ 

कितनी आँखें रोई होंगी

तब जाकर

इतनी नम हुई है ये फिज़ा।


ओस तो सुबह तक सूख जाती है,

मगर ये जो भीगन है

वो रूह तक उतरती है 

कहती है

कि कुछ रातें

मौसम से नहीं,

मोहब्बत से भीगती हैं।


मुकेश ,,,,,,,,,,

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