रूह में रखोगे तो ठहर जाऊँगा
मुझे हथेलियों पर मत रखो
पसीना मुझे बहा ले जाएगा।
जेब में भी मत रखना,
सिक्कों की खनक में
मैं खो जाऊँगा।
नाम की तरह मत पुकारो,
लोगों के बीच
हर आवाज़ घुल जाती है।
अगर रखना ही है—
तो रूह में रखना।
जहाँ साँसें जन्म लेती हैं,
जहाँ धड़कनों का कोई धर्म नहीं,
जहाँ यादें
खून की तरह बहती हैं
बिना शोर किए।
मैं वहाँ
एक हल्की-सी गर्मी बनकर
ठहर जाऊँगा,
न दिखूँगा,
न छूटूँगा।
तुम्हारी उदासी के पीछे
एक उजली परछाई-सा,
तुम्हारी हँसी में
अनसुना-सा स्वर बनकर।
रूह में रखोगे
तो मुझे बचाना नहीं पड़ेगा—
मैं खुद तुम्हें बचाता रहूँगा
भीतर की खाली जगहों से।
और जब कभी
तुम अकेली पड़ जाओगी,
अपने ही सन्नाटे से डरकर—
मैं वहीं मिलूँगा,
ठहरा हुआ,
जैसे कभी गया ही न था।
— मुकेश
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