अनकहा हिस्सा उसकी ज़िंदगी का
उसकी ज़िंदगी में एक हिस्सा है,
जिसके बारे में वो कभी खुलकर नहीं बताती।
ना नाम, ना हक़, ना कोई दावा —
फिर भी उस हिस्से की मौजूदगी हर पल महसूस होती है।
वो हिस्सा जो चुप्पी में बोलता है,
जो उसकी मुस्कान में छुपा है,
जो उसकी खामोशी में गूँजता है।
पति की याद में, प्रेमी की ख़्वाहिश में,
फिर भी वो हिस्सा सिर्फ उसकी है।
मैं हूँ वह अनकहा,
जो उसे सुनता, समझता, सहता है,
पर कभी अपनापन मांग नहीं सकता।
गैरज़रूरी होने के बावजूद,
ज़रूरी है वह हिस्सा,
जिससे उसकी ज़िंदगी पूरी होती है
और मैं… बस वहीं हूँ —
अनकहा, पर हमेशा उसके पास।
मुकेश ,,,,,,,,,,,
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