हर सिलाई में
एक ख़ामोश सिसकी पिरोई है मैंने,
हर धागे में
एक अधूरी दुआ बाँधी है।
तब जा के
दिल के दामन को
रफ़ू कर-कर के बचाए रक्खा है,
वरना ये दामन-ए-इश्क़
कब का हवा की ठोकर से
तार-तार हो चुका होता।
ये जो उधड़ती हुई सिलवटें हैं
इनमें तेरी याद की गर्द बसी है,
हर टाँका किसी बीती शाम का
मातमी अफ़साना कहता है।
कभी कोई ख़याल
सुई बनकर चुभ जाता है,
कभी तेरी आहट
रेशमी धागे-सी
उँगलियों में उलझ जाती है।
मैंने चाहा था
कि इस लिबास-ए-मोहब्बत को
तह कर के रख दूँ
किसी वीरान संदूक में,
मगर हर बार
तेरी ख़ुशबू की रवानी
उसे फिर से ओढ़ा देती है।
अब ये आलम है
रफ़ू भी जारी है,
ज़ख़्म भी बाक़ी हैं;
उदासी की लज़्ज़त से
भीगा हुआ ये दिल
अब भी तेरा नाम
धीमे से दोहराता है।
और मैं…
हर सिलाई में
एक नई सिसकी पिरोता हूँ,
कि दामन-ए-इश्क़
आख़िरी साँस तक
महफ़ूज़ रहे।
मुकेश ,,,,,,,
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