तुम्हारे पास ठहरी हुई सुबह
हम चुप हैं,
जैसे शब्दों ने
आज छुट्टी ले ली हो।
तुम खिड़की के पास बैठी हो,
और धूप
तुम्हारे बालों में
धीरे-धीरे उलझ रही है—
जैसे कोई मासूम बच्चा
खेल रहा हो।
मैं तुम्हें देखता हूँ,
बिना कुछ कहे,
और इस देखने में ही
एक पूरी बातचीत हो जाती है।
कभी तुम्हारी आँखें उठती हैं,
कभी हल्की-सी मुस्कान
होंठों तक आती है
और फिर सब कुछ
फिर से शांत हो जाता है।
इस सन्नाटे में
कोई बोझ नहीं है,
सिर्फ़ एक अपनापन है
जो धीरे-धीरे
दिल में उतरता जाता है।
मुझे लगता है
अगर समय को कहीं रोकना हो,
तो वह पल
यही है
तुम्हारे पास बैठी हुई
एक शांत,
धीमी-सी धड़कती
सुबह।
मुकेश
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