रात चुपचाप उतर रही है,
खिड़की के बाहर चाँद की सफ़ेद परतें गिर रही हैं,
भीतर एक हल्का कंपन है,
जो धीरे-धीरे साँस में उतरता जा रहा है।
मैं स्थिर हूँ—
पर भीतर हलचल है।
हवा जब कानों के पास से गुजरती है
तो उसमें एक अनकहा स्पर्श छिपा होता है।
पलकों के नीचे नर्म उजाला थरथरा रहा है,
पलकों के बीच कोई सपना पिघलता है।
हर बार आँखें बंद होती हैं
तो कोई छवि अपने आप बन जाती है
धुंधली, फिर स्पष्ट,
और फिर वापिस धुंध में खो जाती है।
माथे की सतह पर पसीने की हल्की नमी,
गालों पर उतरती हवा का ठंडा स्पर्श,
मेरे शरीर से मिलकर
जैसे कोई अदृश्य संगीत बना रहा है।
मैं अपनी सांसों को सुनता हूँ,
हर साँस जैसे एक रेखा हो—
ऊपर उठती, फिर नीचे उतरती,
अपने पीछे एक निश्चल निशान छोड़ती।
गर्दन की नसों में
धड़कन की धुन तेज़ हो रही है,
और सीने की हर हलचल
उस लय के साथ चलती है।
हथेलियाँ अब शांत नहीं,
वे धीरे-धीरे बिस्तर की सतह को छूती हैं,
जैसे किसी पुरानी याद का चेहरा सहला रही हों।
हर रेशा, हर नस
अब अपनी बात कहने लगा है।
पीठ की गर्माहट
धीरे-धीरे नीचे की ओर बहती है,
हर स्पर्श एक राग बनता जा रहा है।
देह अब एक वाद्ययंत्र है—
हर अंग में संगीत,
हर हलचल में एक ध्वनि।
उंगलियों के पोर गीले हैं,
अंदर कोई अनजानी लहर है
जो हर स्पर्श को अर्थ देती है।
उंगलियाँ शब्द नहीं जानतीं,
पर वे भाषा से गहरी हैं—
उनके बीच बहता है
कई जन्मों का अनुभव।
गिरती साँस का ताप
सीने को चीरकर पेट तक उतरता है,
जहाँ संवेदना
धीरे-धीरे चेतना में बदल जाती है।
मैं वहाँ टिक जाता हूँ,
उस मध्य बिंदु पर
जहाँ शरीर और आत्मा का मिलन होता है।
विचार गलते हैं,
स्मृतियाँ वाष्प बनकर उड़ जाती हैं।
बचा रह जाता है सिर्फ़ यह अब,
यह क्षण,
यह बेहद नाजुक, बेहद जीवन्त क्षण।
त्वचा के नीचे
रक्त का प्रवाह गुनगुनाता है,
हर स्पंदन में संगीत है,
हर मौन में कोई ध्वनि छिपी है।
मैं अब स्वयं को महसूस करता हूँ,
बिना दर्पण, बिना सीमा।
त्वचा के नीचे के कंपन में
जैसे पूरी सृष्टि condensed है।
कमर के नीचे फैलती गर्मी,
जंघाओं के पास उठता धीमा तनाव,
रीढ़ के सिरे तक भरी ऊर्जा
यह सब किसी गहरे समुद्र की लहरें हैं
जो मुझमें बढ़ती हैं और मुझे ही भर देती हैं।
साँसें और गहरी होती जाती हैं,
बहुत कुछ अब घट रहा है
जो कहा नहीं जा सकता।
यह अनुभव शब्दों से परे है।
होठों की नमी बढ़ गई है,
हर साँस में चाँदनी उतर आई है।
मेरे बालों के सिरों तक
कोई करुण शांति बह रही है।
मैं इस स्पर्श को स्वीकार करता हूँ,
जैसे धरती वर्षा को करती है,
जैसे सीप मोती को,
और जैसे आत्मा अपने ईश्वर को।
मेरा पूरा अस्तित्व
अब एक प्रवाह बन गया है
संगीत, मौन, लय,
सब एक लकीर में घुलते जा रहे हैं।
कहीं कोई आरंभ नहीं,
कहीं कोई अंत नहीं।
मेरी हथेलियाँ अब जड़ नहीं हैं,
वे ब्रह्मांड से बहती ऊर्जा को थामती हैं।
मैं उसकी गति के साथ हिलता हूँ,
जैसे नदी अपने ही किनारे पर टूट जाए।
यह आनंद सीमित नहीं,
यह किसी मिलन का परिणाम नहीं
यह तो जीवन का वह गुप्त हिस्सा है
जो अक्सर अनकहा रह जाता है।
रात अब अपने मध्य में है।
मेरी सांसें और धीमी हैं,
पर गहरी, जीवित, थकी नहीं।
माथे पर ठहरता पसीना
किसी आँसू की तरह पवित्र लगता है।
अब मैं खुद को देख रहा हूँ
बिना शब्द, बिना विचार।
देह स्थिर है,
पर भीतर एक प्रकाश जल रहा है।
यह प्रकाश मेरे सीने से उठता है,
गले तक आता है,
और फिर आँखों के पीछे झिलमिल करने लगता है।
वहाँ से पूरी देह
एक उजले कम्पन से भर जाती है।
मैं अब देह नहीं रहा,
न चेतना, न विचार।
बस एक स्पर्श,
एक अनुभव।
मेरे भीतर बहती हवाओं की दिशा बदल गई है,
मैं अब उनका हिस्सा बन गया हूँ।
धीरे-धीरे सब थम जाता है।
साँस सामान्य होती है,
धड़कनें धीमी,
और त्वचा पर
सिर्फ़ चाँदनी रह जाती है।
वो क्षण पूर्ण है—
न उसमें वासना है, न विरक्ति।
सिर्फ़ एक उदात्त मौन,
जिसमें मैं, देह, और ब्रह्मांड
एक ही लहर में,
एक ही अर्थ में समाए हुए हैं।
मुकेश ,,,,,,
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