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Thursday, 19 March 2026

शाम के ढलने के बाद

 शाम के ढलने के बाद

जब हवा में नमी बढ़ जाती है,

मैं अपने भीतर एक धीमी गर्माहट महसूस करता हूँ

जैसे किसी छूटी हुई धुन ने

फिर से त्वचा को छू लिया हो।


आँखें बंद होते ही

शरीर और आत्मा के बीच

कोई गुप्त संवाद शुरू हो जाता है।

पलकें अपने आप भारी होने लगती हैं,

और उनके पीछे

एक रेशमी उजाला काँपने लगता है।


होंठों पर जो नमी ठहरी है

वह सिर्फ़ सांस का असर नहीं

वह किसी अनकहे मिलन का प्रतीक है,

जहाँ शब्द अपने आप

देह की भाषा में अनुवादित हो जाते हैं।


साँसें अब गहरी हो चली हैं,

उनकी आवाज़

छाती के भीतर से गूंजती है,

मानो कोई लहर

रीढ़ की हड्डी तक उतर रही हो।

हर कंपन, हर हलचल

अब ध्यान का विषय है

अंग-अंग अपनी ही गति में बोल रहा है।


पीठ पर झुकती हवा

किसी अधूरे स्पर्श की याद दिलाती है,

बालों के सिरों में उलझकर

वह धीरे से फिसल जाती है

और गर्म त्वचा पर थमता हुआ मौन बन जाती है।


उंगलियों के बीच

कई अनकही इच्छाएँ पिघलती हैं,

जिन्हें शब्द पहनाने की आवश्यकता नहीं

क्योंकि यहाँ भाषा का अंत है,

सिर्फ़ स्पंदन ही अभिव्यक्ति है।


अंदर एक कोमल उत्तेजना है,

जैसे अग्नि और शीतलता

एक ही चुम्बन में मिल गए हों।

मैं उस ताप में स्थिर हूँ,

ना तृप्त, ना भुखा—

बस उपस्थित,

संपूर्ण अनुभव में उतरता हुआ।


इस क्षण में देह और चेतना

एक ही तरंग पर हैं

जहाँ इंद्रिय ही ध्यान है,

और आनंद स्वयं एक साधना बन जाता है।


मुकेश ,,,,,

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