रात जब अपने पूरे सन्नाटे में उतरती है,
मैं भीतर से सुनता हूँ
साँसों की वह सूक्ष्म धुन
जो हर अंग में एक अलग अर्थ रचती है।
माथे पर हल्की ऊष्मा है,
जैसे कोई अनकहा विचार
त्वचा के आर-पार बह रहा हो।
भौंहों के बीच ठहरा हुआ स्पर्श
धीरे-धीरे पूरे चेहरे में फैलता है,
गालों की कोमलता पर उतरती लहरें
मन को मौन कर देती हैं।
आँखों के कोनों से
नींद और जागरण के बीच की कोई चमक टपकती है।
होठों का स्पर्श अब स्तब्ध है
जैसे किसी अधूरी दुआ के किनारे ठहरा हो।
मैं उस नमी को भीतर तक उतरते महसूस करता हूँ,
हर बार, एक नई कंपकंपी के साथ।
गर्दन से कंधों तक
साँस की गर्माहट बहती है,
और फिर वह एक मधुर कंपन बनकर
छाती में उतर जाती है।
यह कंपन शब्द नहीं मांगती,
यह तो बस अस्तित्व का गान है
जो अपने आप में संपूर्ण है।
हथेलियाँ स्थिर नहीं रहीं;
वे हवा में किसी अनुपस्थित छवि को रेखांकित करती हैं
एक आकार, एक लय,
जो शायद किसी पुरानी स्मृति का रंग लिए हुए है।
उंगलियों के बीच से गुज़रती वह नर्मी
रक्त में एक शांति घोल देती है।
कमर से नीचे की धरती
धीरे-धीरे साँसों की गति में सम्मिलित हो जाती है—
जहाँ हर नस में
किसी मौन नदी का संगीत बहता रहता है।
वहाँ न इच्छा है, न वासना
सिर्फ़ एक अपनापन,
जिसमें मैं अपने ही एहसास से भर जाता हूँ।
धीरे-धीरे, पूरा अस्तित्व
किसी अदृश्य रोशनी में घुलने लगता है,
रात अब मेरे भीतर है,
मैं अब रात के भीतर हूँ
और जो शेष है,
वह सिर्फ़ एक अनकहा कम्पन है,
जिसे मैं जीवन कहता हूँ।
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