मैं रात के सन्नाटे में
खुद को महसूस करता हूँ
जैसे भीतर कोई लहर जागती हो,
कोमल, गर्म, और बेचैन।
हवा में एक अनदेखी खुशबू तैरती है,
वही जो हर बार
खून की धड़कनों को कविता बना देती है।
मैं आँखें बंद करता हूँ,
और एक नर्मी मेरे भीतर उतरती चली जाती है—
धीरे, बिना आवाज़, बिना सीमा के।
यह कैसा जादू है,
जहाँ सिर्फ़ सांसों की गति बची है,
जहाँ सब शब्द पिघल जाते हैं
और बस एक ताप रह जाता है,
जिसमें मैं खुद को हर लम्हे
थोड़ा और विलीन महसूस करता हूँ।
मेरे उंगलियों के पोरों में
कोई अधूरा स्पर्श तैरता है,
जैसे किसी अदृश्य देह की स्मृति
अब भी त्वचा पर रखी हो।
हर साँस में एक नमी है,
हर खामोशी में एक धड़कता संगीत,
जो मुझे भीतर तक खोल देता है।
मैं देह की सीमाओं से गुजरते हुए
किसी रूह की देहरी तक पहुँचता हूँ,
जहाँ आग और शांति
एक ही अर्थ में घुल जाते हैं।
यह अनुभव ना वासनात्मक है,
ना धार्मिक,
बस इतना है—
कि मैं जीवित हूँ,
और उस जीवंतता का हर कण
किसी गहरे मिलन में डूबा है।
रात लंबी होती जाती है,
और मैं उस अनंत स्पर्श में
धीरे-धीरे घुलता चला जाता हूँ
जैसे कोई दीया
अपने ही लौ में
संपूर्ण हो जाए।
मुकेश ,,,
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