चलो किसी वीरान अहसास की गली में
ज़िन्दगी
की चुप दीवारों पर
तेरे
नाम की कोई दरार
ढूँढें।
जहाँ
मोहब्बत गर्द की तरह
उड़ती हो,
और यादें बिन कहे आँखें
नम कर दें।
दास्तानों
की धूल में दबी
वो पहली मुस्कराहट...
अब भी मेरे लफ़्ज़ों
की चादर में
आराम
देखती है।
तुम्हारा
साथ उस छाँव की
तरह था
जो तपते दिन में
एक दरख़्त के नीचे ख़्वाब
बन कर बैठ जाता
है।
मैंने
वक़्त के सफ़्हों पर
तुम्हारे
नाम की तहरीर की
है,
जैसे
कोई सूफियाना नग़मा
किसी
बेज़ुबान दिल से निकलता
हो।
कभी
कभी लगता है —
ज़िन्दगी
एक लम्बा सफ़र है
जिसमें
हम दोनों एक दूसरे की
कमी बनकर
हमेशा
साथ चलते हैं।
तेरे
बिना जो लम्हे गुज़रे
वो ख़ामोशी के रेगिस्तान में
क़दमों
के निशान जैसे हैं —
ना कोई आवाज़, ना
कोई साया
सिर्फ़
एहसास की तपिश।
और फिर भी —
हर दहकती रेत में तेरा
नाम
ठंडी
हवा सा चूम जाता
है।
मुहब्बत
की कूंचियों से
मैंने
इक आसमां रंगा है
जो न तन्हा है,
न मुकम्मल
बस अधूरी दुआओं का असर है
उसमें।
तो चलो, फिर से
उस मोड़ पे मिलें
जहाँ
तुम मुस्कराए थे —
और मैंने पहली बार
ख़ुद
को मुकम्मल महसूस किया था।
मुकेश
इलाहाबादी -----------
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