ये बुझते लम्हों का मौसम है...
ना पलाश की दहक
है,
ना चाँदनी की नमी,
सिर्फ़
एक ख़ामोश रौशनी है
जो दीवारों पे थकी हुई
चलती है...
दिन
अब
सुनसान
गलियों से गुज़रते हैं,
जहाँ
सूरज
बस दीवारों से सिर टकरा
कर
उलझ
जाता है।
बदन
पे धूप की कोई
दस्तक नहीं,
ना साया कोई पीछा
करता है,
बस हवा —
थकी-हारी
कुछ
अनकही दुआओं की तरह
गुज़र
जाती है।
मेरे
महबूब,
अब वो आंधियाँ नहीं
रहीं
जो बाल बिखेर देती
थीं
अब तो बस धूल
है —
जो आँखों में घर कर
लेती है
और रुला भी नहीं
सकती।
शामें
अब
चंदन
नहीं जलातीं,
बल्कि
राख में लिपटी
कुछ
बुझी अगरबत्तियाँ छोड़ जाती हैं...
और रातें?
वो तो
सियाह
रेशमी चादर की तरह
लिपट
जाती हैं ख़्वाबों से,
जैसे
कोई ग़म
धीरे
से दस्तक देकर
पलकों
में उतर जाए।
हर रोज़
एक ठंडी साँस की
तरह
गुज़र
जाता है —
ना आवाज़,
ना आहट,
बस एक एहसास
कि कुछ था
जो अब नहीं है...
हाँ,
मेरे महबूब,
ये बुझते लम्हों का मौसम है...
जहाँ
इश्क़ भी
धीरे-धीरे
राख
होने का हुनर सीखता
है।
मुकेश
इलाहाबादी ------------
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