तुम्हारी
आँखें --
तुम्हारी
आँखें लिख दूँ तुम्हारे
कहने से…
मगर आँखें लिखते ही शब्द पानी
बन जाते हैं।
क्योंकि आँखें सिर्फ़ देखने का ज़रिया नहीं,
ये रूह की खिड़कियाँ
हैं—
जहाँ से दिल अपने
राज़ कहता है।
तुम्हारी
आँखें
कभी चाँद की ठंडी
रौशनी जैसी लगती हैं,
कभी सागर की गहराई
जैसी।
उनमें झाँकूँ तो
मुझे अपना ही चेहरा
नहीं,
अपनी सारी कमज़ोरियाँ और
तमन्नाएँ दिखाई देती हैं।
तुम्हारे
लिए आँखें
शायद आईने हैं—
जिनसे तुम दुनिया देखती
हो।
पर मेरे लिए
तुम्हारी आँखें वो दरवाज़ा हैं
जहाँ से मैं ख़ुदा
तक पहुँचता हूँ।
इन आँखों में कभी हँसी
की चमक है,
कभी आँसुओं की धुंध।
कभी खामोश सवाल हैं,
तो कभी बिन कहे
जवाब।
ये आँखें बोलती नहीं,
मगर हर लफ़्ज़ से
ज़्यादा गहरी होती हैं।
मैं
तुम्हारी आँखें लिखने चला था
तुम्हारी ख़ूबसूरती को समेटने के
लिए।
पर मुझे मिला
उनका सन्नाटा—
जिसमें मोहब्बत भी है,
विरह भी,
और एक अधूरी दुआ
भी।
तुम्हारी
आँखों ने मुझे सिखाया—
कि दुनिया देखने से ज़्यादा
महसूस करने की जगह
है।
और सच यह है—
अगर किसी ने दिल
को पढ़ना है,
तो लफ़्ज़ों की ज़रूरत नहीं,
सिर्फ़ आँखों की रौशनी काफ़ी
है।
मुकेश
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