बारिश की बूँदें खिड़की पर सजदा कर रही हैं,
मेरी साँसें तेरी गर्दन पर सरक रही हैं।
रात का काला आसमान हमें लपेटे हुए है,
तेरा हाथ मेरी कमर पर ठहर गया है, फना हो गया।
तेरी आँखों का समंदर मेरी रूह का किनारा,
हर स्पर्श में डूब रहा हूँ मैं, खुदा को पा रहा हूँ।
तेरे होंठों की अमृत बूँद मेरी प्यास का वज़ीफ़ा,
एक चुम्बन में खो गया पूरा जहान-ओ-जहाँ।
मेरी उँगलियाँ तेरे बालों में उलझ रही हैं,
मैं तेरी गर्दन पर सिर रखूँ तो इबादत लगती है।
कमरे में बस हमारी साँसों का कलमा गूँज रहा,
बारिश बाहर, तूफ़ान भीतर—दोनों एक हो गए।
तेरा तन मेरे तन से लिपट रहा है,
जैसे दो चिंगारियाँ मिलकर आग बन गईं।
हर धड़कन पुकार रही—यह पल जहान है,
तेरे संग जीना ही मेरी हक़ीक़त हो गई।
सुबह की पहली किरण तक लिपटे रहेंगे हम,
बारिश की बाहों में, रूह के मिलन में,
फ़ना होकर भी बाक़ी रहेंगे हमेशा।
मुकेश
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