आज भी रात बहती रही

बैठे ठाले की तरंग ---------

आज भी
रात बहती रही
रोज़ सी
अंधेरी - ठंडी - बेजान
जुगनुओं की चमक
अंधेरों की साँय साँय
और --------------
भयानक सन्नाटे के बीच
तैरता रहा -----
निष्पंद
बगैर किसी प्रतिरोध
बगैर किसी आकांक्षा
बगैर किसी आवेश
यंहा तक कि,
बिना किसी चमकदार
सुबह के इंतज़ार में

मुकेश इलाहाबादी ------------



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